Sunday, July 30, 2017

आजकल


हर तरफ धूल है
धुँआ है
गुबार है।

गर्द इतिहास की
चुभ रही है
पलकों में।

वर्तमान का पानी
धुले
स्पष्ट कर दे
सब गर्द
हालाकिं
वह खुद ही
धुंधला है
गंदला है।

ज्ञान गुप्त रोग सा
बढ़े है
दिनों दिन ,
अपने ही निस्तारण
में प्रयासरत,
अपंग, निष्प्रभ !

आजकल ,

Monday, June 20, 2016

भींगी घरती पहली बरखा!

भींगी धरती
पहली बरखा,
गीले पेड़ गीले पात
नीला अम्बर
हुआ बादली,
तपती पछुआ
हुयी सुरीली,

मस्त मेढ़कों की
टोली ने
धुन छेड़ी अलबेली ,
गाये चिड़िया
गाये तितली !
भींगी घरती

पत्तों के कोरों से
टप टप 
निथर रहा अमृतजल ,
अगहन झुलसी
पियरी माटी
पी पी पानी
                 हो रही है चन्दनी !
                 उठती सुवर्ण गन्ध
                से मदमाते
               हरे आम
                हो रहे हैं पीले,


भींगी घरती
पहली बरखा!
गढ़हे में
भर आया है
छिछला पानी ,

टेंटा-दल कर रहा
मनमानी,
चॊंच-चॊच
पंख पंख
वारिद मोती
उड़ते फर फर,
भींगी घरती
पहली बरखा!




(सभी चित्र वेब से साभार)

Sunday, March 13, 2016

नागा लोककथायें:अरमेजंग और उसके दामाद लेटरसंग की कथा

Ang Chief Women, 1954 Copyright Protected 
मां का असीम प्यार" (पिछली कहनी देखें) नामक पुरानी कहानी में हमें पता चला कि एक मृतात्मा ने लेटरसंग को किस प्रकार एक अच्छा पाठ पढ़ाया. लेटरसंग का दूसरा नाम सुंगदर था. वह अविस्मरणीय घटना यासानारो के पिता को बहुत बुरी लगी थी. उन्हें इस बात का दुख था कि लेटरसंग ने उनकी इकलौती बेटी के साथ अच्छा व्यवहार नहीं किया. वो इस गांव के मुखिया (गांव-बूढ़ा)भी थे. उन्होंने अपनी बेटी के साथ हुये धोखे का बदला लेने के लिए सुंगदर को सबक सिखाने की सोची.

गांव के इस शासक का नाम अरमेजंग था. वह पोंगन कुल से था जबकि उसका दामाद जामिर कुल से था. उन दिनों दुनिया के अन्य लोगों की तरह आओ लोग भी नये बसेरे की तलाश में एक स्थान से दूसरे स्थान जाया करते थे. इसी क्रम में इस गांव ने भी पुरानी जगह छोड़कर सूदुर कहीं विस्थापित होने  की सोची. आओ परम्पराओं और रीतियों के अनुसार यदि कभी किसी पुराने गांव को खाली करके नये स्थान पर गांव बसाना होता था और इस बीच कोई ताबूत अपने अन्तिम संस्कार “त्संग्जू”  (See previous story) के लिए रखा हुआ होता था तो उसे अवश्य़ ही बिना मृत्यु के संस्कार के ही कब्रिस्तान पहुंचाया जाना होता था. भले ही उसका समय पूरा न हुआ हो.

ऐसी परिस्थिति में , गांव-बूढ़ा अरमेजंग ने गांव वालों को नये गांव के लिए यात्रा शुरु करने का आदेश दिया. साथ ही इस अवसर का लाभ उठाते हुये मृत यासानारो के पिता ने अपने दामाद लेटरसंग को अपनी मृत पत्नी का ताबूत अपने कन्धे पर रख कर नये गांव ले चलने का आदेश दिया . निश्चित तौर पर यह लेटरसंग के लिए एक सजा थी. आओ नागाओं के परम्परागत इतिहास में अभी तक ऐसा कभी हुआ भी नहीं था. फिर भी, पिता अरमेजंग ने जानबूझ कर अपनी एक मात्र बेटी का ताबूत उठाकर नयी जगह ले जाने के परम्परा-विरुध्द कार्य के लिए अपने दामाद को आदेश दिया. लेटरसंग के पास आदेश का अक्षरशः पालन करने के अलावा और कोई विकल्प नहीं था. चूंकि आदेश गांव-बूढ़ा का था.

नयी जगह जाने के लिए जब पूरा गांव अपना सामान लेकर गांव के बाहर आ रहा था, लेटरसंग को अपने सिर पर ताबूत ढ़ोना था. इस प्रकार, ताबूत लिए हुये वह अन्य लोगों के साथ यात्रा कर रहा था. नये बसेरे से थोड़ा पहले, एक गांव के पास ,सारे लोग  कुछ क्षण    विश्राम करने के लिए रुके. थोड़ी देर सुस्ताने के लिए लेटरसंग भी रुक गया. अपना सामान—ताबूत पेड़ के सहारे रख टिका दिया और वही उसी के पास बैठ गया. ताबूत के पास बैठे हुये उसने विश्रान्ति की एक गहरी सांस ली. तभी अन्जाने में ही, उसके हृदय से गहरी पीड़ा को व्यक्त करने वाले कुछ बोल फूट पड़े .......

“ वे रोज के रास्ते
जिनपर आती जाती थी यासानारो,
Chang Warrior (From Internet)  
छूट गये हैं पीछे , सुदूर.

कल कल करती,छरहरी जंगली नदी पर 
वो बांस का पुल,
जिस पर आसमान में 
सूरज व चांद की तरह
उगती और अस्त होती थी यासानारो,
अब खाली हैं.

झरनें में खिलने वाला वह फूल
जिसकी खिलती पंखुड़ियों की तरह
मैंनें अपने प्रेम को 
खिलने देने की शपथ ली,
मेरा पुराना गांव
जहां मेरा “ सुंगखू मेयोंग नारो”—सूरजमुखी –
मुरझाकर गिर चुका होगा अब......

कितना सुखद होता,
उसी सूखे फूल के साथ
वही की मिट्टी में 
मेरे इस तन मन का भी 
सूख कर मिल जाना !

“ सुंगखू मेयोंग नारो" एक सुन्दर फूल का नाम था. लेकिन आज लेटरसंग यासानारो को इस नाम से पुकार रहा था. अपने वातावरण से अनभिज्ञ लेटरसंग बैठा हुआ गा रहा था. उसका यह गीत उसके ससुर अरमेंजंग के कानों में पड़ा. गहरी पीड़ा से उमग रहे इस गीत को सुनकर अरमेंजंग को दृढ़ अनुभूति हुयी कि लेटरसंग उसकी पुत्री के प्रति पूरी तरह से क्रूर और अन्यमनस्क नहीं था. हालांकि कि लेटरसंग के व्यवहार में कुछ कमियां थी किन्तु वह अपनी पत्नी को बहुत गहरे मॆं प्रेम करता था.ऐसा महसूस कर अरमेंजंग ने लेटरसंग को तुरन्त माफ कर दिया व ताबूत वहीं छोड़ने को कहा.

   भारी मन से ताबूत वहीं छोड़, वहां से लेटरसंग अन्य गांव वालों के साथ आगे बढ़ा. वे सभी अपनी नयी बस्ती में सुरक्षित पहुंच गये. यह कहा जाता है कि अपने अभीष्ट गांव में बसने से पहले वे जरूर कुछ दिन “अलीबा” नामक गांव में ठहरे थे. वहा कुछ दिन रहने के बाद ही वे अपने गांव “किनुंगर” में रहने गये. जबकि वे सब अलीबा गांव में ही रह रहे थे, लेटरसंग का मन बहुत अशान्त रहता था. अपनी प्रेमिल पत्नी का अभाव उसे हर क्षण खल रहा था. उसका पूरा अस्तित्व अपनी प्यारी पत्नी व पुराने गांव-घर, जहां उसने अपने जीवन के कुछ अच्छे दिन बिताए, की यादों से गूंजता रहता था. बहुत बार उसे ऐसा भी लगता कि एक बार फिर उसे अपने पुराने गांव की यात्रा पर जाना चहिये. जिसे वह वीरान छोड़ आया था.

इसलिए उसने एक दिन अकेले ही पुराने गांव की यात्रा पर निकलने का दृढ़ निश्चय किया. पुराना गांव चंहु दिश ऊंची झाड़ियों हरे जंगली पौधों से भर चुका था. अपने पुराने गांव पहुंच कर वह सबसे पहले वृहत-शिरा “किफूलांग” गया. “किफूलांग” एक बड़ी चट्टान थी जिसकी गांव के लोग पूजा किया करते थे. वहां कुछ क्षण ठहर कर वह अपने पुराने बीते दिनों को याद करता रहा. लेटरसंग इस बड़ी चट्टान के आसपास कभी अपने संगी साथियों के साथ मन में जीवन-मंगल व उत्सव की भावना भर नृत्य करता था ,जंगल गीत गाया करता था. किन्तु आज वहां सब कुछ सूना और उजड़ा हुआ था. जहां कभी हार्नबिल की तीखी झंकारों पर हवा की तितलियां नृत्य करती थी, वहां आज सिर्फ झींगुरों, कीड़े मकोड़ों की कड़वी झुनझुनाहट थी. वहां से वह पुरानी अरेजू (छात्रावास जैसा) के बगल में रखे हुये लकड़ी के बड़े हौदे के पास गया. वे इसमें झरने का पानी एकत्रित किया करते थे. उसने महसूस किया कि हौदे में एक अजीब तरह का खालीपन भरा हुआ है. वह कुएं जैसा हो गया है जिसकी तलहटी में बरसात का पानी जमा है और उसमें कुछ अदृश्य पक्षी पानी पी रहे हैं. वह एक गहरे सन्नाटे में डूब गया. फिर वह पास में ही खड़ी वीरान हो चुकी अरेजू में गया. अरेजू का आच्छादन उखड़ गया था. और हर तरफ बड़ी बड़ी झाड़ियां उग आयी थी.

गहरे दुख में डूबा हुआ लेटरसंग धीरे धीरे गांव के कुएं की तरफ बढ़ा. कुएं का नाम था “लोंग्त्सुबा’. कुएं पर भी उसी तरह खरपतवार झाड़ियां उग आयी थीं. ऐसा लग रहा था मानो वह कभी मानवों द्वारा प्रयोग ही न किया गया हो. आसपास फैले वीरान गांव के मनहूंस दृश्यों ने जैसे उसकी शिराओं को जमा दिया. उसका हृदय डूबने लगा. पुराने जीवन की यादों के बुलबुले उसकी आंखों के सम्मुख तैरने लगे. अपनी प्यारी पत्नी व संगी साथियों के साथ बिताये उल्लास विलास के दिन उसके सम्मुख खड़े से हो गये. अचानक उसका हृदय कहने लगा......

“किफूलांग—मेरी पूजनीय़ चट्टान
बची रह गयी है टूटी फूटी
विचित्र आवाजें करने वाले पतगों के अधिकार में.

मैं देखता हूं
अपने लकड़ी के हौदे का खालीपन
पानी से भरते हुये,
जो चिड़ियों के लिए एक खाली कुआं है.

मेरे हाथों निर्मित अरेजू,
मोरुंग का वो भव्य मुख्य द्वार
सुगठित हरे बांसों के तोरण से सज्जित,
वो लोंग्त्सुबा कुआं –
सब मैंने अपने इन्हीं हाथों से उकेरा—
जहां मेरे साथी मिलते थे
जहां हमारे हृदय में होता था
नव उर्जा का संचार.
वे सभी पथ
जिन पर हैं यासानारों के पदचिह्न,
अब वीरान हैं.
वे सभी पुल
जिनपर यासानारों ने तय की यात्राएं,
रिक्त हैं.


मेरे प्रिय गांव रेथू....
तुम्हारा  फिर से जीवित होना
मेरे लिए एक सपना हैं.”


अन्ततः उस बोझिल वीरान माहौल में उत्कण्ठित हृदय लिए लेटरसंग ने वापस लौटने की सोची. वह सीधे अपने नये गांव आया. अपने परिजनॊं, गांववासियों से मिला. वापस आकर उसने अपने यात्रा की कहानी अन्य लोगॊं को सुनायी. उसने परित्यक्त गांव रेथू का मार्मिक वर्णन किया. लौटने के छठवें दिन ही लेटरसंग ने अपनी अन्तिम सांस ली. संभवतः वह अन्दर से एकदम टूट गया था. अपने पीछे वह अपना एकमात्र बेटा व बूढे ससुर को छॊड़ गया.

माना जाता है कि उसकी आत्मा “डुपुली" (स्वर्ग/मृत्युलोक) चली गयी होगी. वहां वह अपनी यासानारो से मिलेगा और प्रेम व प्रसन्नतापूर्वक सदा सदा उसके साथ रहेगा. क्योंकि ऐसा माना जाता है कि दिपुली में बिछोह नहीं होता. वहां पुराने प्रेमी मिलते हैं. अनन्त प्रेम में सदा सहचर बने रहने के लिए. 

Saturday, December 19, 2015

नागा लोककथायें: मां का असीम प्यार (Ever Abiding love of a Mother)

A Chang Woman carrying her child. 19954. Copyright Protected 
आओ नागओं की पुरानी परंपरा कहती है कि मृत व्यक्तियों के शरीर घर के बाहरी हिस्से में बांस के बने ताबूत में रखे जाते हैं । हांलाकि उन पुराने दिनों  में आओ नागाओं के घर में सिर्फ दो ही कमरे हुआ करते थे। अतः पर्याप्त समय तक वहां रखने के बाद शरीर को कब्रिस्तान में ले जाकर नष्ट कर दिया जाता है. लेकिन मृत शरीर को कब तक घर में रखना है यह मरने वाले की स्थिति अथवा मृत्यु के तरीके व व्यक्ति के अनुसार निर्धारित किया जाता है.  जैसे अगर कोई फसल काटने के समय मरता है तो  नयी फसल के पके हुये चावल से उसका “त्संग्जू” अनुष्ठान किया जाता है और छह दिनों तक उसके शरीर को घर पर रखने के बाद कब्रिस्तान में ले जाकर दफना दिया जाता है. किन्तु यदि आदमी के स्थान पर औरत की मृत्यु हुयी है तो उसे छह दिनों के बजाय पांच दिन ही घर पर रखा जाता है. “त्संग्जू” अनुष्ठान दोनों के लिए एक जैसे होते हैं . कब्रिस्तान में दफनाये जाने के पहले जितनें दिन ताबूत घर पर रहता है उस समय को “लेप्तुसंग्संग” या “लेप्तुसंग्संग-असंगबा कहते हैं.

इस अवधि के दौरान , चाहे वह पांच दिन की हो या छह दिन की , गांव का प्रीस्ट उस ताबूत की रक्षा किया करता है.  सुदूर अतीत के पुराने दिनों में घर पर रखे गये ताबूत की कब्रिस्तान में दफनाये जाने तक रक्षा करना प्रीस्ट लोगों का परम कर्तव्य हुआ करता था.

ऐसा कहा जाता है कि मृत्यु के समय किया जाने वाला अनुष्ठान सिर्फ पके हुये नये चावल से ही किया जाता है. इस तरह अगर कोई आदमी या औरत मर जाती है तो उसका ताबूत तब तक घर पर रखा जाता है जब तक की खेतों की कटायी से मृत्यु का अनुष्ठान करने के लिए नया चावल प्राप्त नहीं हो जाता. यहां तक कि मान लीजिये अगर कोई बुवायी के समय यानी मार्च/ अप्रैल में ही मर जाता है तो उसका ताबूत कटायी के समय तक यानी अगस्त या सितम्बर के शुरुआत तक रखा जाना चाहिये. ताकि कब्रिस्तान में ले जाने के पहले नये चावल से मृत्यु का अनुष्ठान किया जा  सके और मृत्युलोक “डुपुली” जाते समय आत्मा (Soul) अन्न , सब्जियां , मांस या कुछ भी अन्य खाने योग्य वस्तुएं अपने साथ ले जा सके.

इस तरह कुछ मामलों में कई ताबूत कब्रगाह जाने के पहले कई महीनों तक अनुष्ठान के लिए चावल के इन्तजार में घर पर सबके साथ रखे रहते थे. क्योकिं किसी भी आदमी या औरत को बिना अनुष्ठान के कब्रगाह में नहीं ले जाया जाता था, सिवाय उन लोगों के जिनकी मृत्यु अपोडिया (लज्जास्पद मृत्यु जैसे पानी में डूब कर मरना) हो। इसलिए मैं अभी जो कथा कहने जा रहा हूं वह भी आओ नागओं की इसी प्रकार की परंपरा से जुड़ी हुयी है. 

एक बार की बात है. रेथु नामक गांव में एक परिवार रहता था जिसमें तीन सदस्य थे – पति पत्नी और एक छोटा बच्चा. एक बार ऐसा हुआ कि पत्नी बीमार पड़ी और बहुत लम्बे समय तक बीमार रहने के बाद उसनें अपनी अन्तिम सांस ली. अपने बीमारी के दिनों में जब वह मृत्यु-शैया पर पड़ी हुयी थी, उसने अपने पति को बुलाया और उसे शपथ दिलायी कि वह उसकी मृत्यु के बाद दूसरी शादी नहीं करेगा. ऐसा उसने सिर्फ इसलिए किया कि उसका बच्चा उसकी मृत्यु के बाद किसी सौतेली मां के हाथों कष्ट न झेले. उसकी इस बात पर पति सहमत हो गया व उसने पुनः शादी न करने व जीवन भर विदुर रहने की शपथ ली.

इसके कुछ क्षणॊं बाद ही पत्नी की मृत्यु हो गयी और परम्परा के अनुसार उसकी देह को एक ताबूत में बन्द करके घर के बाहरी कमरे में रख दिया गया.
इन परिस्थितियों में, जल्द ही,  अपनी पत्नी की मृत देह ताबूत में रख कर और अपने बच्चे को अकेले छोडकर, पति अक्सर नये साथी की तलाश में बाहर जाया करता था. वह रात में लड़कियों के अरेजू (एक तरह का छात्रावास जहां कुवारी लड़कियां रहती हैं) भी जाया करता था. एक रात हमेशा की तरह अपनी आदत के अनुसार बच्चे को सोया हुआ छोड़ वह घर से दूर चला गया. 

उस काली रात बच्चा नींद से जग गया और अपने आसपास किसी को न पाकर जोर जोर से बहुत देर तक रोता रहा. वहां कोई नहीं था जो बच्चे को उसके बिस्तर से उठाता और उसे चुप कराता .  
इन परिस्थितियों मॆं , ताबूत में मां की आत्मा इस हद तक द्रवित हो उठी कि वह अब और अधिक समय तक मूक द्रष्टा नहीं रह सकी. वह अपने बच्चे के अत्यधिक नजदीक आ गयी. अपने अत्यन्त प्रगाड़ व स्थायी मातृ-प्रेम के साथ लोरी गाने लगी ताकि उसका बेटा सो जाय.

जब वह इस प्रकार गा रही थी तभी वहां उसका पति वापस आया. थोड़ी ही दूर से उसने लोरी  सुनी और उसे महसूस हुआ कि  जरूर कोई है जो उसके न रहने पर उसके बच्चे की देखभाल करता है . इसके ठीक विपरीत जब वह घर में घुसा तब अपने बच्चे के बगल में उसने अपनी पत्नी का ताबूत देखा और तुरन्त ही समझ गया कि लोरी गाने वाला कोई और नहीं बल्कि ताबूत में मौजूद उसकी पत्नी की आत्मा ही है .

पति को देखकर तुरन्त ही ताबूत उठ खड़ा हुआ और उसकी तरफ बढ़ने लगा. यह देख बच्चे का पिता अत्यन्त भयभीत हो गया और ताबूत से बचने के लिए यहां वहां भागने लगा.
ताबूत ने उसे गांव की गलियों सड़कों पर दौड़ा लिया . इस दौरान ताबूत से एक विचित्र तरह की आवाज आ रही थी. ताबूत से भागते भागते वह मोरूंग ( एक पवित्र स्थल) पहुंच गया. आओ लोगों का ऐसा विश्वास है कि कोई आत्मा या कोई शक्तिशाली शैतान भी मोरुंग में प्रवेश नहीं कर सकता, खासकर उसके मुख्य रास्ते को पार करके. और मोरुंग में सामान्य घरों की तरह अन्य खिड़कियां और दरवाजे नहीं होते.

मोरूंग के दरवाजे पर ताबूत धराशाही हो गया, दुबारा कभी न उठने के लिए. 
गांव में घटा यह आश्चर्य उस व्यक्ति के लिए और उन सबके लिए जिसने यह सुना , बहुत बड़ा सबक साबित हुआ.

इस कहानी में जिस मां का अपने बच्चे के लिए असीम प्यार था, जिसनें कब्रिस्तान जाकर भी अपने बच्चे का ध्यान रखना न छोड़ा, उसका नाम कुछ और नहीं बल्कि यासानारो व उसके अभागे पति का नाम लेटरसंग था. 

Friday, October 30, 2015

पोषण के बारे में ...

फल सब्जी
दूध किसमिस
में ही नहीं,

कुछ  विटामिन्स  
तो सिर्फ
और सिर्फ
तुम्हारे होठों में होते हैं .....

चुप ताजे 
ललछहूं होठों में .........

Friday, September 11, 2015

नागालैण्ड की लोककथायें: एक लड़की की कथा जिसे सर्प दंश से मरना था !




एक बार की बात है एक परिवार रहता था जिसमें सिर्फ दो ही बच्चे थे. उन दिनों एक बार घर का मुखिया माथा लेने ( नर-मुण्ड शिकार अभियान पर) गया क्योंकि वह एक योध्दा था. वह और उसके साथी अपने पीछे अपनी पत्नियों और बच्चों को घर पर छोड़ , बहुत दूर के गांवों में शत्रुओं का शिकार करने चले गये. 

यह सुनने में आता है कि उस व्यक्ति की पत्नी को जल्द ही बच्चा होने वाला था. बहुत बहादुरी व सफलतापूर्वक युध्द करने के बाद परिवार का मुखिया युध्द में मारे गये शत्रुओं का सिर पुरस्कार स्वरूप लिए हुये वापस आ रहा था. रास्ता बहुत लम्बा होने के कारण वे जंगल के रास्ते में किसी स्थान पर “संगपित संग” नामक विशाल व घने वृक्ष के नीचे रुके ताकि रात बिता सकें.  

Ang (Chief) of Village in Costume with Gun, Ceremonial Dao (Machete), and Carrying Bag Near Carved Facade of his Longhouse 1954Konyak (Copyright Protected)
वहां वे उसी पेड़ की छाया में सोये. उन्होंने अपने शत्रुओं के सिर अपने घास के पतले बिछावन से पास रख दिया. ऐसा कहा जाता है कि उस रात उस योध्दा ने एक सपना देखा. सपने में भी वही बड़ा सा पॆड़ ,वही छाया थी. उसने देखा बड़े ही विचित्र और विकृत रूप वाले दो मनुष्य जो कि ऐसा विश्वास किया जाता है कि प्रेत थे , कहीं जा रहे थे. वे प्रेत योध्दा को देख थोड़ी देर रुके एवं बताया कि सुदूर गांव में किसी स्त्री को बच्चा होने वाला है. वे वहीं जा रहे हैं. इतना कह कर वे चले गये.
स्वप्न देखने वाले योध्दा को लगा कि वह स्वप्न नहीं बल्कि सच्चाई देख रहा है. और वस्तुतः सच में यह एक अर्थपूर्ण आभास था. योध्दा उठ बैठा. वह सोचने लगा कि कहीं उसका यह आभास सुदूर गांव में स्थित उसकी पत्नी के होने वाले बच्चे से तो नहीं जुड़ा हुआ है?  उसकी इस सोच ने उसे अशान्त कर दिया. 

थोड़ी देर बाद वह पुनः सोया और फिर से सपना देखा जो कि पहले वाले सपने से जुड़ा हुआ था. इस सपने में भी वही दोनों प्रेत उसी विशाल पेड़ की छाया के नीचे आये जहां योध्दा सो रहा था. अतः योध्दा ने उन्हें सामने पाकर , जैसे कि वे सच में ही सामने खड़े हों, उनसे उस गर्भिणी औरत के होने वाले बच्चे के बारे में पूछा , जैसा कि वे पिछले स्वप्न में कह गये थे.
योध्दा के प्रश्नों का जवाब देते हुये प्रेतों ने बताया की उस औरत को एक लड़की पैदा हुयी है. उन्होंने और कहा कि उस लड़की की मौत सांप के काटने से होगी, ऐसा प्रेतों ने निर्धारित कर दिया है. इस स्वप्न के बाद योध्दा पुनः उठ बैठा. उसे पता चला यह भी एक स्वप्न ही था, निस्संदेह ही सच्चाई नहीं. फिर भी उसने तुरन्त ही सपनों के बारे में सोचना शुरु कर दिया. उसे लग रहा था कि दोनों सपने सुदूर गांव में उसकी पत्नी को होने वाले बच्चे से जुड़े हो सकते हैं. 

अशान्त व थका हुआ , घर का हाल चाल जानने के लिए चिन्तामग्न वह घर पहुंचा. जब उसने एक नन्ही लड़की को अपनी पत्नी के पास लेटे हुये देखा तब तथ्यों की पुष्टि करने के लिए पूछताछ की कि उसकी पत्नी को कब बच्चा हुआ ? और वह स्पष्ट हो गया कि जिस रात उसने स्वप्न देखा था उसी रात उसकी पत्नी को बच्चा हुआ था. 

तुरन्त ही उसने अपना सपना और उसकी संभावित व्याख्या अपनी पत्नी को बताया और कहा कि हो सकता है कि वह सपना परमपिता परमेश्वर द्वारा उनके बच्चे के भाग्य की भविष्यवाणी हो. उसी समय उसने अपनी पत्नी को चेतावनी भी दी वह लड़की को कहीं भी , गांव के बाहर न भेजे और घर पर ही रखे ताकि किसी जहरीले सांप को उस पर हमला करने का मौका न मिले और उसकी मृत्यु न हो.
इन परिस्थितियों में दोनों ने बचाव के हर उपाय करने  का निर्णय लिया जिससे उनकी बेटी संर्प-दंश से होने वाली मृत्यु के भयानक दुर्भाग्य से बच सके क्योकिं आओ नागा परम्पराओं के अनुसार संर्प-दंश से होने वाली मृत्यु एक शर्मनाक , लज्जास्पद मौत होती थी जिसे अपोडिया ( Apodea) कहते हैं, जैसा कि उन्होंने अपनी बेटी के लिए सपने में हुयी भविष्यवाणी में देखा था.

इसी प्रकार के माहौल में उनकी बेटी बड़ी हुयी व किशोर हो गयी. इसके बाद उसके माता पिता ने उसे बार बार चेतावनी दी  ताकि उसके जीवन में कोई अनिष्ट न हो. फिर भी उसके जीवन में वह समय आ गया जब उसे शादी करके अपने पति के साथ पति के गांव जाना था. 

खतरे का आभास करके पिता ने उसके पति को आदेश दिया कि वह लड़की को अपने कन्धे पर उठाकर दूसरे गांव ले जाय. लड़के ने पिता की बात मानकर वादा किया कि पूरे रास्ते वह लड़की को कहीं भी पैदल नहीं चलने देगा और अपने कन्धे पर ले जायेगा. इस वादे के साथ उन्होंने यात्रा शुरू की ताकि कम से कम रास्ते में उसे कोई सांप न काट सके व उसकी मृत्यु न हो. 

इस प्रकार उन्होंने आधे रास्ते की दूरी तय कर ली , तभी लड़की ने अपने पति से कुछ देर रुकने के लिए कहा ताकि वह मूत्र विसर्जन कर सके. वे वही रुक गये और लड़की थोड़ा आगे झाड़ी की तरफ बढ़ी. तभी उसका पैर एक मरे हुये सांप हुये छोटे सांप के मुंह के ऊपर से रगड़ गया जो उसकी नजरों से ओझल पड़ा हुआ था. तत्क्षण ही सांप के दांत लड़की के पैरॊं में धस गये और नसों में जहर पहुंच जाने के कारण भयानक दर्द शुरु हुआ. वहां से उसे जल्दी जल्दी गांव ले जाया गया. गांव पहुंचते पहुंचते उसके प्राण पखेरू उड़ गये. 

यह हमें बताता है कि ईश्वर ने जो नियति निर्धारित की है वह घटित होनी ही है, उसे कोई नहीं बदल सकता. क्योकिं सब कुछ उसी तरह होगा जैसा ऊपर वाले ने निर्धारित कर रखा है.

Sunday, August 9, 2015

नागालैण्ड की लोक कथायें : कोढ़ी का इलाज ( खण्ड 3)

नागालैण्ड की लोक कथायें : कोढ़ी का इलाज ( खण्ड २)

............जारी.

उस जवान का गांव वापस आना एक सपने जैसा ही था. उसके सगे सम्बन्धियों ने उसका खूब स्वागत किया. उसने लोगों को उत्साहपूर्वक बताया कि किस तरह पेर (सांप) के दिखाये गये जादूयी पौधे से उसने अपनी भयानक बिमारी का इलाज किया. इस अवसर पर सभी ने ध्यानपूर्वक पौधे के बारे में जानकारी ली. और प्रसन्नतापूर्वक सर्वशक्तिशाली ईश्वर को धन्यवाद दिया जिसने अपने सेवकों को सांप के द्वारा एक भयानक बीमारी से ठीक होने का रास्ता दिखाया.
वस्तुतः सर्वशक्तिशाली ईश्वर के इस गहन प्रेम के
लिए पूरे गांव ने खूब उत्सव मनाया.

इसके बाद वह व्यक्ति अपने पुराने दिनों की तरह , रोज रात अरेजू (लड़कियों का छात्रावास) गया. वहां उसने लड़कियों के व्यवहार में बहुत परिवर्तन महसूस किया. पुराने दिनों से अलग, घुसते ही , लड़कियों ने उसे आग के पास वाला स्थान बैठने के लिये दिया. लेकिन उसने बैठने के लिए वह स्थान लेने से इन्कार कर दिया और पुराने दिनों की तरह वह कमरे के एक कोने में बैठा. इससे तुरन्त ही लड़कियां आंसू बहाने लगी. जल्द ही सबने आंसू पोछे और एक दूसरे से बहाना किया कि धुंए की वजह से उनके आंसू निकलने लगे थे.


जल्द ही उस व्यक्ति ने शादी कर ली और सभी बीमारियों से आजाद एक सुखी घर बसाया, अपने बुरे अतीत को भुलाकर. उस आदमी का नाम लामसंग था. और वह जिस गुफा में रहा था उसे अब लामसंग यदेन कहा जाता है. यह गुफा अब भी उंग्मा गांव के पास लामसंग रोगी के दुख व कठिनाई की कहानी कहती , स्थित है. 
                               ***********

Thursday, August 6, 2015

नागालैण्ड की लोक कथायें : कोढ़ी का इलाज ( खण्ड २)





(नागालैण्ड की लोक कथाएं : कोढ़ी का इलाज,खण्ड १)

जैसे ही उसने झाड़ियों के बीच झांका , उसे एक बड़ा पेर (कोबरा, जहरीला सांप) दिखायी दिया. ध्यान से देखने पर पता चला कि पेर की पूरी देह पर कोई रोग है जिससे उसकी चमड़ी सड़ गयी है. वह बहुत बुरा लग रहा था, मानो उसे कुष्ठ रोग हो.
पेर धीरे धीरे आगे बढ़ने लगा. उस व्यक्ति ने अपने आप को पेड़ों के पीछे छुपा लिया और चुपचाप पेर को देखता रहा. पेर थोड़ी दूर जाकर वहां उगी एक चौड़े पत्तों वाली घास को खाने लगा . आदमी आश्चर्यपूर्वक पेर और उस घास को देखता रहा. कुछ पत्तियां खा लेने के बाद पेर धम्म से पास के झरने के गहरे पानी में डुबकी लेने उतर गया.
काफी समय तक नहाने के बाद पेर( सांप) गहरे पानी से बाहर आया. लेकिन अब वह एकदम नया पेर लग रहा था. उसकी त्वचा बहुत मुलायम व कोमल हो गयी थी. उस पर वह गन्दा कुष्ठ रोग नहीं था. यह शानदार परिवर्तन बस कुछ मिनटों में हुआ था. इसके बाद पेर वहां से झाड़ियों में सरक गया, कभी दुबारा न दिखने के लिए.
यह सब देखकर जवान व्यक्ति एकदम स्तम्भित रह गया. उसने उस जादूई पौधे के बारे में जानना चाहा जो सांप की ऐसी गन्दी और भयानक चमड़ी की बीमारी को दो पल में धुल सकता है. थोड़ा ही खोजने के बाद उसे वह पौधा मिल गया . यह सोचकर कि जैसे पेर की चमड़ी चमक उठी , वैसी उसकी भी हो जाएगी, जवान आदमी ने पौधे की कुछ पत्तियां निगल ली , कुछ अपनी देह पर मल ली. उसके बाद पेर की तरह उसने भी झरने के गहरे पानी में डुबकी लगा दी. और जब वह बाहर आया तो उसने अपने शरीर में आश्चर्यजनक परिवर्तन देखा.
अब उस जवान व्यक्ति की देह पर गन्दी और जर्जर चमड़ी कहीं भी नहीं थी. थी तो बस चमकदार कोमल , नयी त्वचा, बिलकुल किसी बच्चे जैसी. अत्यन्त ही आह्लादमय आश्चर्य के साथ वह जवान व्यक्ति एक नए प्राणी के तौर पर बाहर आया. जैसे कि यह सब एक सपना हो. हांलाकि यह सब एक सच था. और उस जवान व्यक्ति के पास कोई ऐसा शब्द नहीं था जिससे इस आश्चर्यजनक रूप से चंगा कर देने वाली शक्ति के प्रति हो रही खुशी को व्यक्त कर सके. इसी खुशी में वह अपने घर, गांव की ओर चल पड़ा, अपनी अधेरी गुफा को सदा के लिए छोड़कर.   
                                                                 .............जारी.

Wednesday, August 5, 2015

नागालैण्ड की लोक कथाएं : कोढ़ी का इलाज



(लोक को समझने का एक उपयुक्त माध्यम हो सकती हैं लोककथायें. नागालैण्ड के मोकोकचुंग शहर में घूमते हुये मिली एक छॊटी सी पुस्तक में आई. बेन्डान्गंगाशी जो कि एक अंडरग्राउंड लीडर थे, द्वारा संकलित पचास लोककथाएं मुझे मिली. संकलन अंग्रेजी में था. लेकिन पढकर लगा की कथाओं में नागा लोक संस्कृति की जटिलताओं व साथ ही साथ , सरलताओं की सफल अभिव्यक्ति हुयी हैं. किसी “इचबा” (बाहरी/भारतीय) के नागालैण्ड को समझने , देखने का एक जरिया हो सकती हैं ये कथाएं. प्रस्तुत है अनुवाद का यह प्रयास........)



Ang (Chief) in Partial Costume, with Ear Plugs and Necklaces And Two of his Wives in Costume Near Woven Bamboo Houses with Thatch Roofs 1954 Konyak (Copyright protected)
कोढ़ी का इलाज
(A Leper finds healing power)
खण्ड १. बहुत वर्षों पहले की बात है। एक जवान आदमी था जिसे चमड़ी का रोग था। उसकी पूरी देह पर गन्दे निशान थे। इस कारण उसके गांव वालों ने उससे कोई भी बात व्यवहार बन्द कर दिया था व उससे घृणा करते थे. एक जवान आदमी के तौर पर वह भी दूसरे जवानों की तरह अपने आप को किसी लड़की से जुड़ा हुआ देखना चाहता था और इसलिय अक्सर वह रात को अरेजू ( छात्रावास जैसा जिसमें गांव की सारी कुंवारी लड़कियां एक साथ रहती हैं)   के चक्कर लगाता था. फिर भी किसी सुन्दर लड़की ने उसमें रुचि नहीं दिखायी. कोई उससे बात नहीं करना चाहता था. 

  यहां तक कि उसे पूरी दुनियां ही बिलकुल सूनी लगने लगी थी. इतनी सूनी जैसे कि नर्क हो. ऐसा कहा जाता था कि वह गांव के एक सम्मानित परिवार से था लेकिन इससे उसकी कठिन समस्या का निदान नहीं हुआ. उसने बहुत सोचा. सोचा और सोचा. आशाओं , निराशाओं से जूझते हुये अन्त में उसने अपने प्रिय सगे सम्बन्धियों , नाते रिश्तेदारों को छोड़कर जंगल में बसने  का निर्णय लिया. उसने आशा की कि उसे थोड़ी शान्ति मिलेगी. अपने निर्णय के अनुसार भोर में ही उसने दुख और जरूरतों से भरे जंगली जीवन के लिए अपना गांव छोड़ दिया. और बहुत दिनों तक जंगल में यहां वहां भटकने के बाद वह एक गुफा में पहुंचा . वहां पास में ही एक छोटा सा झरना था. 

यहां तक कि तुरन्त ही उसने वहीं रहने की सोची और रहने के लिए हर जरूरी जुगाड़ किया. बहुत सी व्यवस्था के बाद वहां रहने लायक घर जैसा हो पाया. तब , उसी दिन से वह वहां अकेले ही रहा. किसी भी आदमी के सम्पर्क से अछूता, केवल जंगली जानवरों व घने अंधेरे जंगल के शैतानों की संगति में. 

वहां रहते हुये एक दिन सुबह वह अपनी गहरी निद्रा से उठा और गुफा में चुपचाप शान्ति से बैठा रहा. तभी उसे एक आवज सुनायी दी. उसे लगा कि आसपास झाड़ियों में कुछ है. वह धीरे से उठा और दबे पांव उधर गया जहां से आवाज आ रही थी.      
                                                     ..............(जारी)